अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं जिनका आधिकारिक एजेंडा भले सार्वजनिक न किया जाए, लेकिन उनके राजनीतिक संदेश लंबे समय तक महसूस किए जाते हैं। मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच करीब 40 मिनट चली बैठक भी ऐसी ही एक मुलाकात मानी जा रही है। मुख्यमंत्री ने इसे शिष्टाचार भेंट बताया और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कीं, लेकिन जिस समय यह बैठक हुई और उसके पहले तथा बाद की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर डालें तो तस्वीर कहीं ज्यादा बड़ी दिखाई देती है। अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा विवाद, सुप्रीम कोर्ट की ओर से ट्रस्ट और सरकार को नोटिस, भाजपा के संगठनात्मक फेरबदल, 2027 विधानसभा चुनाव की शुरुआती तैयारी और विपक्ष के बदलते सामाजिक समीकरण इन सभी घटनाओं के बीच हुई यह बैठक राजनीतिक गलियारों में कई सवाल छोड़ गई है। भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने देशभर में 240 सीटें जीतीं, लेकिन उत्तर प्रदेश में पार्टी का आंकड़ा 62 से घटकर 33 पर आ गया। सहयोगियों के साथ एनडीए की संख्या 36 रही, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का रिकॉर्ड बनाया और कांग्रेस ने भी छह सीटें अपने खाते में जोड़ लीं। सबसे बड़ा राजनीतिक झटका अयोध्या वाली फैजाबाद लोकसभा सीट पर लगा, जहां राम मंदिर निर्माण के बावजूद भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से पार्टी लगातार उन कारणों की समीक्षा कर रही है जिनकी वजह से अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिल सका।
इसी पृष्ठभूमि में भाजपा का पूरा फोकस अब 2027 विधानसभा चुनाव पर है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 202 सीटों का बहुमत चाहिए। 2022 में भाजपा गठबंधन ने 273 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन 125 सीटों तक पहुंचा था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण बदलते दिखे हैं। भाजपा यह मानकर चल रही है कि विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होते हैं, फिर भी पार्टी किसी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है। दिल्ली में शाह और योगी की मुलाकात को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बैठक में सिर्फ कानून-व्यवस्था या विकास परियोजनाओं की समीक्षा नहीं हुई होगी, बल्कि संगठन, सामाजिक समीकरण, विपक्ष की रणनीति और चुनावी नैरेटिव पर भी विस्तार से चर्चा हुई होगी। खासतौर पर ऐसे समय में जब विपक्ष लगातार अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गड़बड़ी के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी होने के बाद भाजपा भी अतिरिक्त सतर्क नजर आ रही है क्योंकि पार्टी नहीं चाहती कि विपक्ष धार्मिक आस्था से जुड़े इस विषय को उसके खिलाफ राजनीतिक अभियान में बदल दे।
दिलचस्प बात यह है कि शाह-योगी मुलाकात से कुछ दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का उत्तर प्रदेश दौरा भी इसी रणनीतिक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्रियों, प्रदेश संगठन, सांसदों, विधायकों और जिला स्तर तक के पदाधिकारियों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। इन बैठकों में सबसे अधिक जोर संगठनात्मक अनुशासन, बूथ प्रबंधन और लोकसभा चुनाव में सामने आई कमजोरियों को दूर करने पर दिया गया। पार्टी नेतृत्व ने साफ संदेश दिया कि व्यक्तिगत बयानबाजी या गुटबाजी से बचते हुए सभी नेताओं को एक ही राजनीतिक लाइन पर काम करना होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब सामाजिक समीकरणों की है। समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले के सहारे उल्लेखनीय सफलता हासिल की। अब अखिलेश यादव इस दायरे को और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लखनऊ समेत कई जिलों में ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी गैर-यादव पिछड़ों के साथ ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से को भी जोड़ने में सफल होती है तो मुकाबला और कठिन हो सकता है।
इसी वजह से भाजपा भी समानांतर सामाजिक रणनीति पर काम कर रही है। गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित, महिला मतदाता, लाभार्थी वर्ग और युवा वोटरों पर विशेष फोकस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, हर घर जल, आयुष्मान भारत, मुफ्त राशन और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के करोड़ों लाभार्थियों को भाजपा अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लगभग 15 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है। किसान सम्मान निधि के लाभार्थियों की संख्या भी दो करोड़ से अधिक बताई जाती है। पार्टी का मानना है कि इन्हीं लाभार्थियों के बीच दोबारा मजबूत पकड़ बनाना चुनावी जीत की कुंजी होगी। दूसरी ओर विपक्ष पूरी ताकत से भाजपा के खिलाफ नया नैरेटिव तैयार करने में जुटा है। अयोध्या चढ़ावा विवाद, महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दों को लगातार उठाया जा रहा है। हाल के दिनों में लखनऊ, मथुरा और अन्य शहरों में लगे राजनीतिक पोस्टरों ने भी माहौल को और गर्म कर दिया है। एक ओर भाजपा समर्थक खेमे की तरफ से समाजवादी पार्टी पर तीखे राजनीतिक हमले किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर सपा इसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश बता रही है। यानी 2027 की लड़ाई सिर्फ विकास बनाम विकास नहीं होगी बल्कि नैरेटिव, प्रतीक और भावनात्मक मुद्दों की भी होगी।
इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार विकास परियोजनाओं की गति तेज करने में जुटे हैं। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, डिफेंस कॉरिडोर, एयरपोर्ट, मेट्रो और औद्योगिक निवेश परियोजनाओं पर तेजी से काम कराया जा रहा है। फरवरी 2023 में आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में लगभग 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया गया था। सरकार का कहना है कि इनमें से बड़ी संख्या में परियोजनाएं धरातल पर उतर चुकी हैं। चुनाव से पहले इन परियोजनाओं का असर दिखाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। राजनीतिक संकेत इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल पर विशेष जोर दिया जाएगा। लोकसभा चुनाव के दौरान कई सीटों पर स्थानीय स्तर पर संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की कमी की चर्चा हुई थी। अब भाजपा इस गलती को दोहराना नहीं चाहती। बूथ समितियों के पुनर्गठन से लेकर शक्ति केंद्रों को सक्रिय करने तक व्यापक अभियान की तैयारी चल रही है। पार्टी का लक्ष्य 2027 से पहले हर बूथ पर सक्रिय संगठन खड़ा करना है। दिल्ली में हुई शाह-योगी मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यही माना जा रहा है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारी को लेकर अब प्रतीक्षा की स्थिति में नहीं है। विपक्ष जहां अपने सामाजिक समीकरणों को विस्तार देने में जुटा है, वहीं भाजपा संगठन, सरकार, विकास और वैचारिक मुद्दों को एक साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रही है। आने वाले महीनों में अयोध्या, कानून-व्यवस्था, विकास परियोजनाएं, सामाजिक समीकरण और लाभार्थी राजनीति ये पांच बड़े मुद्दे उत्तर प्रदेश की चुनावी बहस की धुरी बन सकते हैं। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में हुई यह 40 मिनट की बैठक सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि 2027 की सबसे लंबी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआती पटकथा के रूप में देखी जा रही है।



