सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई कड़ी आपत्ति, कहा- ‘रेप की कोशिश’ मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता जरूरी

रक्षा-राजनीति नेटवर्क

नई दिल्ली। महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें बंद कमरे में महिला का सीना दबाने और उसकी सलवार उतारने की कोशिश को ‘बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape)’ का मामला नहीं मानते हुए आरोपी को राहत दी गई थी।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशीलता, गहन कानूनी अध्ययन और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट बोला- जजों को गंभीर कानूनी पड़ताल करनी चाहिए

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक निर्णय केवल सतही तथ्यों के आधार पर नहीं दिए जा सकते। उन्होंने टिप्पणी की,

“जजों को संवेदनशील होना चाहिए। उन्हें रिसर्च करनी चाहिए। बिना गहन कानूनी पड़ताल के फैसले नहीं दिए जाने चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह 9 जुलाई 2026 को आए पटना हाईकोर्ट के फैसले की विस्तृत समीक्षा करेगा और इस संबंध में विस्तृत आदेश जारी करेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान उठा मुद्दा

यह मामला उस समय सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित एक समान प्रकृति के मामले की सुनवाई कर रहा था। उस मामले में आरोपी पर नाबालिग बच्ची का स्तन पकड़ने और उसके पायजामे की डोरी तोड़ने का आरोप है।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने अपने तर्क के समर्थन में पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसले का हवाला दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्णय पर गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या अत्यंत सावधानी और संवेदनशीलता के साथ की जानी चाहिए।

महिलाओं से जुड़े अपराधों पर महत्वपूर्ण संकेत

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बलात्कार के प्रयास जैसे मामलों में केवल घटना के सीमित पहलुओं को नहीं, बल्कि आरोपी की मंशा, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।

शीर्ष अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में न्यायिक फैसले कानून की भावना, पीड़िता के अधिकारों और स्थापित कानूनी मानकों के अनुरूप होने चाहिए।

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