बिहार में इफ्तार पार्टी के बहाने पार्टियों ने किया अपनी ताकत का प्रदर्शन

In Bihar, parties demonstrated their strength on the pretext of Iftar party

अशोक भाटिया

बिहार में विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाई जाने लगी है। चुनावी माहौल के बीच रमजान का महीना चल रहा है, जिसके चलते रोजा इफ्तार दावत की बहार देखने को मिल रही। सियासी पार्टियां रोजा इफ्तार के बहाने मुस्लिम समुदाय वोटबैंक को साधने की है, जिसके लिए नमाज पढ़ने वाली टोपी लगाने से लेकर गमछे को पहनने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इस तरह मुस्लिम रंग में रचे-बसे हुए नेता नजर आ रहे हैं, किसी की दावत में जाने से मुस्लिम तंजी में इनकार कर रही तो किसी की महफिल में जाने को बेकरार हैं। इस तरह बिहार में मुस्लिम पॉलिटिक्स होती दिख रही है?

आज राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की तरफ से इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। लालू प्रसाद के इफ्तार पार्टी में मुस्लिम संगठनों के लोग और वामपंथी दल और कांग्रेस के कुछ विधायक शामिल हुए। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इफ्तार पार्टी से दूरी बनाई। यही नहीं वीआईपी के मुकेश भी नहीं पहुंचे। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता कह चुके है कि अबकी चुनाव में उन्हें बड़ा हिस्सा नहीं मिला तो वो अकेले चुनाव लड़ेगी ।

ज्ञात हो कि रमजान के महीने में हर साल राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव इफ्तार पार्टी का आयोजन करते हैं। लालू प्रसाद हर साल अपने सरकारी आवास 10 सर्कुलर रोड पर इफ्तार पार्टी का आयोजन करते थे। लेकिन आज लालू प्रसाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद के सदस्य अब्दुल बारी सिद्दीकी के सरकारी आवास 12 स्ट्रेंड रोड पर किया गया।इफ्तार पार्टी में लालू प्रसाद यादव खुद एक्टिव दिखे। इफ्तार पार्टी में लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बिहार विधानसभा में विरोधी दल के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, अब्दुल बारी सिद्दीकी, शिवानंद तिवारी सहित राजद के सभी विधायक महागठबंधन के सहयोगी वामपंथी दलों के नेता और कई विधायक इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। कांग्रेस विधायक प्रतिमा दास इस इफ्तार पार्टी में शामिल हुई।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय के अनुसार बिहार में महागठबंधन की सियासत लालू प्रसाद यादव के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी। बिहार में कांग्रेस की राजनीति भी पिछले 25 वर्षों से राजद के सहारे ही चलती रही है। लेकिन कांग्रेस पार्टी अब अपना संगठन विस्तार करने में लगी हुई है। यही कारण है कि नए प्रभारी एवं नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति की गई है।लालू प्रसाद के द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी में कांग्रेस के बड़े नेताओं की दूरी यह दिखा रही है कि महागठबंधन में सब कुछ सामान्य नहीं है। कांग्रेस के कुछ एक विधायकों का पहुंचना और बिहार कांग्रेस के बड़े नेताओं का इस इफ्तार पार्टी में शामिल नहीं होना यह संकेत दे रहा है कि कहीं कांग्रेस कुछ अलग राजनीति या रणनीति तो नहीं बना रही। सबसे बड़ी बात है कि कृष्णा अल्लावारु जब से बिहार के प्रभारी बने हैं एक बार भी लालू प्रसाद से मुलाकात करने नहीं गए।

लालू प्रसाद द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टी में महागठबंधन में नए राजनीतिक समीकरण भी देखने को मिला। राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस, बिहार अध्यक्ष प्रिंस राज और पार्टी के वरिष्ठ नेता सूरजभान सिंह इस इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। मीडिया से बातचीत में पशुपति कुमार पारस ने बताया कि रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। इफ्तार पार्टी में शामिल हुए हैं। बिहार में नई राजनीतिक समीकरण के सवाल पर उन्होंने कहा कि ”समय आने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।”

उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से मुख्यमंत्री आवास पर रविवार को इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया। इफ्तार पार्टी में कई मुस्लिम नेताओं के साथ समाज के लोगों ने हिस्सा लिया। हालांकि इससे पहले कई मुस्लिम संगठनों की ओर से इफ्तार पार्टी में जाने से इनकार किया गया था। जदयू के नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार मुस्लिम के साथ हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इफ्तार पार्टी में आधा दर्जन से ज्यादा मुस्लिम धार्मिक संगठनों के बॉयकॉट के बावजूद बड़ी संख्या में रोजेदार शामिल हुए। इफ्तार पार्टी में शामिल होने के लिए पूर्व मंत्री मोनाजिर हसन भी सीएम आवास पहुंचे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि नीतीश कुमार ने ही मुसलमानों के लिए सबसे ज्यादा काम किया।

नीतीश कुमार ने जदयू के मुस्लिम नेताओं को पैचअप में लगाया है, लेकिन उसके बावजूद इफ्तार पार्टी पर असर इस बार दिखा है। हालांकि पार्टी में कैमरा और मोबाइल दोनों ले जाने की मनाही थी। इफ्तार पार्टी में जिन लोगों को मुख्यमंत्री आवास में एंट्री हुई उन्हें मोबाइल भी बाहर रखना पड़ा और कड़ी जांच के बाद जाने दिया गया है पास के माध्यम से ही एंट्री था।

जदयू मुस्लिम नेताओं ने कहा यह राजद की साजिश है। चुनावी साल में लेकिन इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है। नीतीश कुमार ने मुसलमान के लिए जितना काम किया है। मुस्लिम नीतीश कुमार के साथ हैं। मुख्यमंत्री आवास में हुए कर पार्टी में एनडीए के कई नेता भी शामिल हुए।ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, इमारत-ए-शरिया, जमीयत उलेमा हिंद, जमीयत अहले हदीस, जमात-ए-इस्लामी हिंद, खानकाह मुजीबिया और खानकाह रहमानी ने वक्फ बिल को लेकर नीतीश कुमार और जदयू के फैसले पर नाराजगी जताते हुए इफ्तार पार्टी बायकाट किया था।

बताया जाता है कि वक्फ बिल को लेकर जदयू ने लोकसभा में पुरजोर समर्थन किया था। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने समर्थन करते हुए इसे मुसलमान के हित में बताया था। उसके बाद से हैं मुस्लिम संगठन नीतीश कुमार से अपनी नाराजगी जताते रहे हैं नीतीश कुमार के साथ बैठक कर भी अपनी नाराजगी जताई है।

बताया जाता है कि बिहार में सीमांचल सहित तीन दर्जन से अधिक सीट ऐसे हैं। जिसमें मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं 243 सीटों में से तीन दर्जन सीटों में मुस्लिम वोटरों की आबादी 20 से 40% के करीब है 11 सीट तो ऐसे हैं जहां 40 फीसदी से भी अधिक वोट मुस्लिम के हैं।मुस्लिम वोटरों पर राजद और महागठबंधन की नजर तो है ही साथ ही एआईएमआईएम और प्रशांत किशोर की भी नजर है। सीमांचल में 2020 में एआईएमआईएम ने 5 सीटों पर जीत हासिल की थी। मुस्लिम पहले से नीतीश कुमार से नाराज हैं और वक्फ बिल को लेकर उनकी नाराजगी और बढ़ी है। ऐसे में मुस्लिम संगठनों के बायकाट ने नीतीश कुमार की मुश्किलें और बढ़ा दी है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड बिहार के अध्यक्ष इर्शादुल्लाह के अनुसार ये सियासी स्टंट है। ये आरजेडी वालों का क्रिएट किया गया है। इफ्तार का कभी ठुकराया नहीं जाता है। ये पहली बार देख रहा हूं कि इफ्तार पार्टी का बॉयकॉट किया गया है। यह दुखद है।चुनाव में इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। 50 फीसदी नीतीश को वोट करने जा रहे हैं।” –

यह पहली बार नहीं है । इफ्तार के बहाने बिहार में सियासी उठा पटक भी होता रहा है। बिहार में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत के करीब है। आरजेडी इतनी बड़ी आबादी को अपना वोट बैंक बनाने के लिए मुसलमानों और यादवों का एम-वाई समीकरण बना लिया है। यादवों की 14 प्रतिशत जनसंख्या मिला कर यह आबादी 31-32 प्रतिशत के करीब हो जाती है। मुसलमान भाजपा को तो वोट करते ही नहीं। अब जेडीयू से भी कट गए। ऐसे में थोक में मुसलमानों के वोट पर महागठबंधन की नजर है। आरजेडी कैंप यकीनन इस बात पर खुशी होगी कि उलेमाओं ने नीतीश की इफ्तार पार्टी का बहिष्कार किया। पर, यह भी सच है कि मुस्लिम वोटों का दावेदार तब अकेले महागठबंधन की ही पार्टियां नहीं होंगी।

बिहार के उलेमाओं ने जब सीएम नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का बायकॉट किया। इसकी उलेमाओं ने शर्त भी रखी। स्पष्ट कहा कि एनडीए में रहते हुए वक्फ संशोधन बिल का विरोध करें, वर्ना वे इफ्तार पार्टी का बहिष्कार करेंगे। नीतीश कुमार बिना कोई प्रतिक्रिया दिए खामोश रह गए। बायकॉट के पत्र पर दस्तखत करने वाले रविवार को आयोजित पार्टी में नहीं पहुंचे। इसके बावजूद खासा तादाद में रोजेदारों और सियासी जमावड़े के बीच इफ्तार पार्टी संपन्न हुई। नीतीश ने इफ्तार के जरिए अपने 225 वाले लक्ष्य को फिक्स कर लिया है।

यह सच भी है कि नीतीश कुमार के कार्यकाल में मुसलमानों के हित में काफी काम हुए हैं। इसके बावजूद मुसलमानों के वोट जेडीयू को उस तरह नहीं मिलते, जितना उन्होंने उनके लिए काम किए हैं। इसका कारण शायद नीतीश कुमार का एनडीए में होना है। वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में तो जेडीयू के टिकट पर खड़े उम्मीदवारों में एक भी नहीं जीत पाया। जेडीयू ने 11 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। भला हो जमा खान का, जो जीते तो चिराग पासवान की पार्टी के टिकट पर, लेकिन सदन पहुंचते ही उन्होंने जेडीयू का दामन थाम लिया और नीतीश मंत्रिमंडल में उनके भरोसे के साथी बन गए।

ज्यादा दिन नहीं बीते, जब जेडीयू सांसद और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने कहा था कि मुगालते में न रहें, मुसलमान जेडीयू को वोट नहीं करते। यह बात अलग-अलग मौकों पर उन्होंने दो बार कहीं थी । उनसे पहले जेडीयू के ही एक सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने भी ऐसी ही बात कही थी। उन्होंने तो ललन सिंह से भी एक कदम आगे बढ़ कर कह दिया था कि उनको मुसलमानों और यादवों ने वोट नहीं दिया। इसलिए वे उनका कोई काम नहीं करेंगे। उलेमाओं के बायकॉट के ऐलान के बाद नीतीश कुमार की चुप्पी से अंदाज लगता है कि उन्हें भी इससे पीड़ा पहुंची है। पहुंचे भी क्यों नहीं, नीतीश कुमार ने न सिर्फ उनके लिए काम किए, बल्कि उन पर किसी तरह का जुल्म भी अपने कार्यकाल में नहीं होने दिया है।

उधर जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर की भी मुस्लिम वोटों पर चौकस नजर है। उन्होंने 40 मुसलमानों को इस बार विधानसभा का टिकट देने की घोषणा की है। एआईएमआईएम वाले असदुद्दीन ओवैसी भी मुस्लिम वोटों के हिस्सेदार बनेंगे ही। मुस्लिम बहुल सीमांचल की पांच सीटें पिछली बार जीत कर और गोपालगंज विधानसभा के उपचुनाव में आरजेडी उम्मीदवार को हरा कर वे अपनी ताकत का एहसास करा चुके हैं। इसलिए महागठबंधन को अभी इतराने से परहेज करना ही श्रेयस्कर होगा।

अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

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