भारत का कथित सेक्युलर वर्ग मुस्लिम कट्टरपंथ पर चुप्पी ओढ़ लेता है : तसलीमा

India's so-called secular class remains silent on Muslim fundamentalism: Taslima

(बंगलादेश से निर्वासित, दुनियाभर में चर्चित लेखिका और एक्टिविस्ट तसलीमा नसरीन से संजय सिंह की ख़ास बातचीत)

आर्काइव गैलरी से 23 Dec 2016

स्त्री के स्वाभिमान और अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुये तसलीमा नसरीन ने बहुत कुछ खो दिया। अपना भरापूरा परिवार, दाम्पत्य और नौकरी सब कुछ दांव पर लगा दिया। खोने की पराकाष्ठा थी देश निकाला..निर्वासन। वर्ष 1994 में प्रकाशित अपने उपन्यास ‘लज्जा’ की वजह से तसलीमा को बंगलादेश से निर्वासित कर दिया गया। उन्होंने भारत में कोलकाता को अपना घर बनाना चाहा, लेकिन वर्ष 2007 में इस्लामी संगठनों के विरोध के चलते उन्हें रातोंरात शहर छोड़ना पड़ा। उसके बाद से वह कभी कोलकाता नहीं लौट सकीं। तब पश्चिम बंगाल में सीपीएम नीत वाममोर्चा सरकार थी। लेकिन सत्ता बदलने के बाद ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनको कोलकाता जाने की अनुमति नहीं मिल सकी। तसलीमा को स्वीडन ने नागरिकता दे रखी है और भारत सरकार ने वर्ष 2011 से रेजीडेंट स्टेटस दे रखा है। लेकिन बंगलादेश और पश्चिम बंगाल में अब उनका लौटना असम्भव ही दिख रहा है। कहा जा सकता है कि निर्वासन का जीवन तो सलमान रश्दी भी जी रहे हैं और रूसी लेखक एलेंक्जेंडर सोलजेनित्सिन (निधन 3 अगस्त 2008) ने भी जिया है। पर तस्लीमा अपने को इस मायने में सलमान से अलहदा मानती हैं। वह कहती हैं, ‘‘ आजादी के लिए मैंने अपना जीवन समर्पित किया है और सलमान रश्दी मात्र लेखक भर हैं। मेरे लेखन का एक उद्देश्य है। मैं कुछ करने की जिम्मेदारी महसूस करती हूं। मैं तो औरत के हक और आजादी के लिए लिखती हूं। मैं आजादी के लिए लड़ रही हूं। मैं जब आजादी की बात करती हूं तो उसका मतलब सिर्फ मेरे लिए आजादी नहीं है। मैं समूची नारी जाति के लिए आजादी का बात करती हूं। क्यों कि औरतों को तो आजादी मिलती ही नहीं। मैं जीवन में संघर्ष कर रही हूं और जीवन को आजादी के लिए समर्पित कर चुकी हूं।’’ निर्वासन के बाद भी तस्लीमा का लेखन लगातार जारी है..और अगर यह कहा जाए कि उसके बाद लेखन की तीव्रता और गति और भी तेज हो गई तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि उनके लेखन पर साहित्यिक चर्चाओं के बजाए विवाद ज्यादा खड़े हुए हैं। उनके लेखन को रचनात्मक के बजाए विवादास्पद ज्यादा कहा गया ! सच तो यह है कि साहित्यिक रूप से उनके लेखन का आकलन होना अभी बाकी है। बंगलादेश से निर्वासित होने के बाद तसलीमा एक विश्व नागरिक का जीवन जी रही हैं- ‘‘दिस वर्ल्ड इज माई विलेज’’। लेकिन यह विडम्बना ही है कि भारत ने उन्हें पनाह जरूर दी है, लेकिन यहां की नागरिकता के लिए उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। उन पर मौत का खतरा बराबर बना हुआ है। कट्टरपंथियों ने उनके सिर पर ईनाम भी रखा है।

तसलीमा का जन्म 25 अगस्त सन 1962 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह शहर में हुआ था। उन्होंने मयमनसिंह मेडिकल कालेज से 1986 में चिकित्सा विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद सरकारी डाक्टर के रूप में कार्य आरम्भ किया। जिस पर वे 1994 तक थीं। जब वह स्कूल में थीं तभी से उन्होंने कवितायें लिखना प्रारम्भ कर दिया था। तसलीमा के गजब के जीवट और जज्बे को मैं सलाम करता हूं। प्रेस क्लब आफ इंडिया में हुई एक खास मुलाकात के दौरान तसलीमा ने बहुत सारे मुद्दों और निजी जीवन पर बहुत ही बेबाकी और विस्तार से टूटी-फूटी हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला में गुफ्तगू की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश-

कट्टरपंथियों से आपको डर नहीं लगता ? आपके अपने देश बांग्लादेश में पिछले दिनों एक ब्लागर की टुकड़े-टुकड़े कर हत्या कर दी गई ? आपको भी लगातार धमकियां मिलती रहती हैं ?

  • मैं डरती नहीं। लेकिन सतर्क जरूर रहती हूं। बांग्लादेश में यह खबर छपी थी कि मुझे मारने के लिये तीन स्लीपर्स लगाये गये हैं। मुझे लगता भी है कि कट्टरपंथी ताकतें मुझे मारना चाहती हैं। मुझे बराबर थ्रेट भी मिलता रहता है। मैं उनके खिलाफ प्रदर्शन करना चाहती हूं। अगर मैं लिखना बंद कर दूं तो वे जीत जायेंगे और मैं हार जाऊंगी। मैं ऐसा नहीं चाहती। मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं उनके खिलाफ लिखना नहीं बन्द करूंगी। मैं कट्टरपंथियों, बुरी ताकतों के खिलाफ अपनी मौत तक लड़ती रहूंगी।

भारत में जो कथित बुद्धिजीवी अपने को सेकुलर कहते हैं, उनके बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है ?

  • भारत में कतिपय लोग जो अपने को सेक्यूलर (धर्मनिरपेक्ष) कहते हैं, उनकी सारी सेक्यूलरिज्म हिन्दू धर्म के कट्टरपंथ के खिलाफ ही क्यों है, वे मुस्लिम कट्टरवाद और पाखंड पर क्यों नहीं कुछ बोलते ! इससे ये साबित होता है कि इन दिनों यहां धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि क्षद्म धर्मनिरपेक्षता ज्यादा चल रही है। क्यों कि सेक्यूलर होने का मतलब सिर्फ हिन्दू धर्म की कुरीतियों पर ही प्रहार करना नहीं होता। सेक्यूलर होने का मतलब सभी धर्मो के प्रति निरपेक्षता का भाव। न कि सिर्फ हिन्दू धर्म के प्रति या फिर किसी एक धर्म के प्रति। भारत में जो लोग अपने को सेक्यूलर कहते हैं, वे मुस्लिम कट्टरपंथियों पर खामोश हो जाते हैं। उनके खिलाफ एक आवाज नहीं उठाते ! रियल सेक्यूलर को तो सभी तरह के धार्मिक कट्टरता की खिलाफत करनी चाहिए। कुछ हद तक यह कहा जा सकता है कि यहां असहनशीलता बढ़ रही है। बहुत से बुद्धिजीवियों और लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाये हैं। विरोध जताने के इस तरीके को मैं ठीक मानती हूं। लेकिन मुझे यह सोचकर अजीब लगता है कि जब मुझे पश्चिम बंगाल से निकाला गया, कोलकाता टीवी के लिए मैंने जो मेगासीरियल लिखा था उसे बैन कर दिया गया, तो किसी बुद्धिजीवी ने इस तरह विरोध प्रदर्शन नहीं किया। भारत में मुझे लगता है कि लेखक और बुद्धिजीवी यहां मुस्लिम कट्टरवाद की अपेक्षा हिन्दू रुढ़िवाद के खिलाफ ज्यादा हैं। शायद इसलिए कि उन्हें लगता होगा कि मुसलमान भारत में माइनारिटी में हैं तो उन्हें सुरक्षा की ज्यादा जरूरत है।

बंगलादेश में जो परिस्थितियां आपके लिये थीं, वही हालात भारत में आपके सबसे पसंदीदा स्थान कोलकाता में भी बन गए। वहां से आपको हटाया गया। हैदराबाद में आप पर हमला किया गया ?

  • हिन्दुस्तान ज्यादा लोकतांत्रिक है। यहां लम्बे समय से लोकतंत्र है। इसकी तुलना बांग्लादेश से नहीं की जा सकती। और जैसा कि मैने पहले भी कहा है कि मैं खुद को हिंदुस्तान में ज्यादा सुरक्षित पाती हूं। हालांकि यहां घटी घटनाओं से मैं थोड़ी परेशान जरूर हुई थी। पिछले सालों में कई मौकों पर मुझे तरह-तरह से धमकियां मिलीं। लेकिन हैदराबाद में प्रत्यक्ष रूप से जो कुछ भी मुझे देखने को मिला, उससे उबरने में मुझे वक्त लगा। मेरे लेखन के साथ ही मुझे अपमानित करने, मारने, धमकी देने की कोशिशें लगातार जारी हैं। लेकिन हैदराबाद में मेरे साथ जो कुछ हुआ, उसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं था।

आप आजादी की बात करती हैं । नारी की आजादी की बात। आपके लिए आजादी की परिभाषा क्या है ?

  • मैं जब आजादी की बात करती हूं तो उसका मतलब केवल मेरी आजादी नहीं है। मैं सबके लिये आजादी की बात करती हूं। इस क्षेत्र में यानि कि भारतीय उपमहाद्वीप में औरतों को तो आजादी मिलती ही नहीं है। मैं अपने जीवन में संघर्ष कर रही हूं और जीवन को आजादी के लिये समर्पित कर रही हूं।

भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति को लेकर आपका क्या नजरिया है। आपने क्या कुछ महसूस किया है ?

  • भारत में भी बहुत सख्त पुरुषवादी समाज है। सच तो यह है कि पुरुष और स्त्री दोनों ही यहां महिलाद्वेषी हैं। महिलाओं और खासकर छोटी लड़कियों के लिए यह खतरनाक देश है। भ्रूण हत्याओं के मामले में भारत पहले स्थान पर है। पाकिस्तान और बंगलादेश से भी आगे है। भारत में दहेज हत्यायें, वेश्यावृत्ति, लड़कियों की अवैध खरीद-फरोख्त और घरेलू हिंसा जैसी कुरीतियां अभी भी व्याप्त हैं। यहां की पढ़ी-लिखी युवतियों से उम्मीद की जा सकती है कि इसके खिलाफ आवाज उठायेंगी, लेकिन वो भी चुक ही रहती हैं। यहां बहुत जरूरी है कि नारीवादी आन्दोलन तीव्र हो।

आप भारत की नागरिकता के लिए लम्बे समय से प्रयास कर रही हैं। आपने गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी ! इस सरकार से आपको क्या उम्मीदें थीं ?

  • मुझे इस बात का अफसोस है कि भारत सरकार मुझे टुकड़े-टुकड़े में रेजीडेंट परमिट देती है ! जब कि बहुत सारे लोग हैं उन्हें पांच साल-दस साल के लिये रेजीडेंट परमिट मिल जाती है। लेकिन फिलहाल संतोष इस बात का है इस बार भारत में रहने का रेजीडेंट परमिट मुझे एक साल के लिये मिला है। भाजपा नीत राजग सरकार पर जब आई तो मुझे सिर्फ दो माह का रेजीडेंट परमिट दिया। फिर चिल्लाई तो एक साल का दिया। यह सच है कि मैं केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिली। मैंने उनसे लम्बे समय के लिये रेजीडेंट परमिट देने का अनुरोध किया। राजनाथ सिंह जी बोला कि 50 साल तक देगा। मैंने बोला कि इतने सालों तक नहीं बचूंगी। 2004 से यहां रेजीडेंट परमिट मिलता है। बहुत सारे लोगों को पांच-दस साल का मिल जाता है। रही बात इस सरकार से उम्मीद की तो मेरे लिए हर सरकार एक जैसी ही है। यह आश्चर्यजनक ही है कि यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में रेजीडेंट परमिट दिया। लेकिन वर्ष 2008 में उसी सरकार ने ये परमिट देने में आनाकानी की। राजनाथ सिंह से मैने कहा कि मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, भारत सरकार बस मुझे रेजीडेंट परमिट देती रहे। उन्होंने एक साल के परमिट के मंजूरी दे दी। मैं यह भी चाहती हूं कि भारी बहुमत के साथ भारत में जो यह (एनडीए) सरकार आई है, वह बंगलादेश लौटने में मेरी मदद करे। भारत सरकार बंगला देश कर सरकार से बात करे। मैंने यूपीए सरकार से भी इस बारे में बात की थी।

आप भारत में ही क्यों रहना चाहती हैं ?

  • मैं भारत में रहना चाहती हूं, क्यों कि मैं और कहां जाऊंगी ! मुझे नहीं लगता कि अब मुझे कभी बंगलादेश लौटने दिया जाएगा। मैं यूरोप की नागरिक हूं। अमेरिका की स्थाई निवासी भी हूं। लेकिन मैंने सांस्कृतिक समानता के कारण भारत को रहने के लिए चुना। मुझे अब बंगलादेश में वापस आने की अनुमति अगर मिल भी जाएगी तो भी मैं भारत में ही शेष जीवन बिताना पसंद करूंगी। ऐसा इसलिए है कि पिछले 21 सालों में बंगलादेश से ज्यादा मेरे दोस्त भारत में हैं। इस तरह की विचारधारा के साथ जीने पर रिश्तेदार नहीं, बल्कि वे लोग अहम हो जाते हैं, जिन्हें आपके सिद्धान्तों पर भरोसा हो। बंगलादेशी प्रकाशकों और बुद्धिजीवियों ने भी मुझसे संपर्क रखने की कोशिश नहीं की। सच तो यह है कि मेरे देश और मेरे बीच का रिश्ता अब टूट गया है।

आपने कहीं यह भी कहा है कि आप दिल्ली में सुरक्षित महसूस नहीं करतीं ?

  • मुझे यहां रहना इसलिए पसंद है कि मेरे बहुत सारे दोस्त यहां रहते हैं। कोलकाता के बाद दिल्ली ही ऐसी जगह है भारत में जो मुझे अपनापन देता है। लेकिन मैं सुरक्षित महसूस नहीं करती। मेरे पास स्वीडन और अमरीका का वीजा है। लेकिन मुझे दिल्ली में रहना अच्छा लगता है।

यायावर की जिंदगी जीते-जीते, कभी ऐसे भी पल तो आते होंगे कि एकांकीपन दुख देता होगा, दिल में पीड़ा होती होगी ? आपके लिए जीवन का मायने क्या है ? ऐसे में जब दो दशक से अधिक समय से निर्वासन …?

  • यायावर की जिंदगी मैंने खुद नहीं अपनाया। पर यह जिंदगी खुद हो गई है। मैं अपने लेखन के कारण निर्वासित हुई हूं। अपने विचारों के कारण मुझे अपने देश से बाहर होना पड़ा है। इसलिए मेरे लिए मेरे जीवन का मायने अपने विचारो को व्यक्त करते रहना है। रही बात अकेलेपन की.. तो मैं बता दूं कि मैं अकेलेपन का अनुभव नहीं करती। क्यों कि मैं जानती हूं कि मुझे प्यार करने वाले लोगों की एक बड़ी तादाद है। वे मेरा समर्थन करते हैं।

तो माना जाए कि निर्वासन ने आपको ज्यादा स्ट्रांग और रचनात्मक बनाया है ?

  • बेशक। आप ऐसा कह सकते हैं।

अपना देश छूट गया और भारत में भी आपकी पहली पसंद कोलकाता में नहीं रहने दिया गया ? कोई परमानेंट ठिकाना न होने का गम तो सालता होगा ?

  • मुझे ऐसा महसूस नहीं होता कि मेरा अपना कोई देश नहीं है। मुझे चाहने वाले, मेरे लेखन को पसंद करने वाले, मेरे दोस्त दुनिया भर में हैं। वे लोग जहां भी हैं मुझे बहुत मानते हैं, प्यार करते हैं। दिस यूनिवर्स इज माई वर्ल्ड। दिस गलेक्सी इज माई कंट्री। एंड दिस वर्ल्ड इज माई विलेज।

चलो अच्छा है बंगलादेश छूटा तो पूरी दुनिया में आपके दोस्त बन गये ! निर्वासन ने आपको विश्व नागरिक बना दिया।

  • हां, यह सच है..ज्यादा दोस्त बने हैं। लेकिन उसमें से ज्यादा दुश्मन भी बन गए हैं। .और यह भी एक तरह से सही ही है कि मैं अब वैश्विक नागरिक हूं। ये मुझे अच्छा लगता है। मेरे मन में विचार आता है कि हम सभी इस वि के लोग हैं।

ज्यादा दोस्त बने, तो उसमें से ज्यादा दुश्मन क्यों हो गए !

  • जो महिला की समानता का विरोधी है। जिसको वोमेन का फ्रीडम अच्छा नहीं लगता। वो हमारा दुश्मन बन गया है। कंजरवेटिव लोग मुझको पसंद नहीं करते।

अगले जन्म में आप क्या बनना चाहेंगी ?

  • मैं पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करती। ऐसी कोई ज्वाइस नहीं है। आई डोन्ट लाइक बार्न अगेन।

यह एक हाइपोथेटिकल सवाल है ! मान लीजिए कि पुनर्जन्म होता ही हो । तो किस रूप में जन्म लेना चाहेंगी। क्या बनना चाहेंगी।

  • वैसे तो मैं पुनर्जन्म पर यकीन नहीं करती, जैसा बताया आपको । लेकिन अगर ऐसा होता होगा तो मैं अगले जन्म में तसलीमा ही बनना चाहूंगी। यह कैरेक्टर बोल्ड है। समझौता नहीं करता है।

भारत में कौन सा शहर सबसे अच्छा लगता है ? कोलकाता के अलावा ।

  • कोलकाता के साथ मेरा रिलेशन बहुत पुराना है। छोटी थी तबसे कोलकाता जाती रहती थी। कोलकाता के बाद दूसरे नम्बर पर दिल्ली है, जहां अपनापन महसूस होता है। यहां भी मेरे बहुत सारे दोस्त हैं। यहां अच्छा लगता है। वैसे यहां शहर तो बहुत सारे हैं जो बहुत ही अच्छे हैं। बहुत पहले कश्मीर गई थी। वहां डल झील में शिकारा में सैर किया था।

आपको अपना घर, गांव, शहर और वहां की गलियां, जहां आपका बचपन बीता। जहां आप जवान हुई। और जहां आपने पढ़ाई पूरी की..सब कुछ तो बहुत याद आता होगा ?

  • याद तो वह आता है ना, जो कभी भूला हो या भुला दिया गया हो ! अपनी यादें ..आत्मकथा मैंने सात खंडों में लिखी है।

पिछले दिनों आपने एक नवयुवक के साथ अपनी तस्वीर फेसबुक पर साझा की थी। उसे आपका ब्वायफ्रेंड बताया जा रहा है, जिसकी उम्र आपसे काफी कम है !

  • (थोड़ी गम्भीरता के साथ और कड़े स्वर में) सो व्हाट ! ये तो इम्पार्टेट नहीं है। फेसबुक पर तो बहुत कुछ लिखती रहती हूं। बहुत कुछ पोस्ट करती हैं। बहुत सारी तस्वीरें भी..।

क्या हिंदी साहित्य भी पढ़ती हैं ? हिंदी का कौन सा लेखक आपको प्रेरित करता है ?

  • हिंदी स्क्रिप्ट तो नहीं पढ़ सकती। बंगला में अनुदित प्रकाशित कुछ हिंदी साहित्य मैंने पढ़ी है।

क्या सिनेमा देखने का शौक है ? इधर कौन सी मूवी देखी ?

  • पिछले दिनों हिंदी मूवी- मसान देखी। अच्छी लगी। अच्छी अंग्रेजी फिल्में देख लेती हूं। हाल के दिनों में ‘मार्सियन’ देखी।

इन दिनों आप क्या कुछ खास लिख रही हैं ?

  • कुछ न कुछ तो मैं लिखती ही रहती हूं। नारी के अधिकार पर किताब लिख रही हूं। इस समूचे उपमहाद्वीप में नारी कैसे परेशान होती है, कैसे उसे परेशान किया जाता है..धर्म के नाम पर, कठमुल्लावाद के नाम पर, उनके खिलाफ होने वाले डोमेस्टिक वायोलेंस (घरेलू हिंसा), दहेज उत्पीड़न इत्यादि को लेकर मैं लिख रही हूं। मैं महिलाओं के बारे में इसलिए लिखती हूं कि वह फाइट करने की हिम्मत कर सके। मेरी यह बुक कोलकाता बुक फेयर में रिलीज होगी।

आपके आलोचक कहते हैं कि आपके लेखन में कुछ भी रचनात्मक नहीं है ? आपको यह सुनकर बुरा नहीं लगता ?

  • मैं ऐसा नहीं समझती। वे झूठ बोलते हैं। वे मेरी विचारधारा का विरोध करते हैं, इसलिए मेरे लेखन को भी बुरा कहते हैं।

आप पर विवादास्पद लेखन के आरोप लगते हैं ? बुर्के के खिलाफ भी आपने लिखा था !

  • मैंने बुर्के के खिलाफ लिखा तो कुछ साहित्यकारों ने मुझ पर विवादास्पद विषयों पर लिखने का आरोप लगाया। लेकिन यह विवादास्पद विषय नहीं है। मेरा मानना है कि बुर्का दमन का प्रतीक है। इसलिए मैं बुर्का के खिलाफ लिखती हूं। मुझे जो सही लगता है मैं उसे पूरी स्वतंत्रता से लिखती रहूंगी। मैं एक प्रजातंत्र में रहती हूं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बराबरी में यकीन रखती हूं। मैं कभी भी अपने आपको वो लिखने से नहीं रोकूंगी जिसे मैं सही मानती हूं। मैं हमेशा से खुलकर लिखती रही हूं। मुझे मेरे देश से बाहर भेज दिया गया। मैं निर्वासित होकर रह रही हूं। फिर भी मैंने सच लिखने से कभी भी खुद को नहीं रोका। मेरा मानना है कि एक लेखक तभी मर जाता है जब उससे लिखने का अधिकार छीन लिया जाता है।

विवादित लेखन के आरोप में ही आपकी पुस्तक ‘द्विखंडित’ को काफी साल पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था !

  • पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मेरी इस किताब पर पाबंदी लगा दी थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कार्य एक वामपंथी सरकार ने किया। 25 लेखकों और बुद्धिजीवियों की समिति ने भी द्विखंडित को प्रतिबंधित करने की अपनी रिपोर्ट दी थी। इस समिति में शांखो घोष और सुनील बंधोपाध्याय जैसे साहित्यकार थे, जिनकी मैं दिल से इज्जत करती थी। कोलकाता के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों के मेरे प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना देखकर मैं अचंभित तो हुई ही थी दुख भी हुआ था। दरअसल पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवी अपने को प्रगतिशील दिखाते तो हैं लेकिन उनकी सोच में कोई विकास नहीं हुआ है।

लेकिन आपके खिलाफ बंगलादेश और भारत के पश्चिम बंगाल की राजनीति में साम्यता क्यों नजर आती है ?

  • मेरे अपने देश बंगलादेश में शीर्ष नेताओं के बीच चाहे कितनी भी दूरियां हों, मेरे मामले में वे एक साथ नजर आते हैं ! पश्चिम बंगाल में भी ऐसा ही है। उन्हें लगता है कि मुझे निकालने से उन्हें मुसलमान वोट मिलता है। लेकिन यह सच नहीं है।

बंगलादेश में ब्लागरों की हत्या हुई। हत्यारों को सरकार पकड़ने में नाकामयाब रही !

यह अनफोर्चुनेट है। वे सेक्युलर ब्लागर थे, जिन्हें इस्लामिक टेरोरिस्ट ने मार डाला। वहां की सरकार हत्यारों को अभी तक नहीं पकड़ सकी है। इससे ये लगता है कि वह (सरकार) इस्लामिक फंडामेंटालिस्ट के साथ कम्प्रोमाइज करती है। हसीना सरकार (बंगलादेश की मौजूदा सरकार) राजनैतिक कैदियों को फांसी भी देती है। इससे उनके सपोर्टर्स काफी एंग्री हो जाते हैं। मुझे लगता है कि इसलिए सरकार ब्लागर्स के कातिलों को नहीं पकड़ती, बैलेंस करने के लिए फंडामेंटालिस्ट को।
बंगलादेश में जो इस्लाम को क्रिटिसाइज करता है उसका वे (फंडामेंटालिस्ट) खून कर देते हैं। वहां से बहुत ब्लागर अमेरिका चले गए। कम्यूनिटी में तो अच्छे लोगों को, सेक्यूलर लोगों को रहना होगा, जो फंडामेंटालिस्ट को बैलेंस करते हैं। वहां फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन नहीं है। वहां आईसीटी (इनफॉर्मेशन कम्यूनिटी टेक्नोलोजी)-57 एक्ट है, जिसके तहत इस्लाम को क्रिटिसाइज करने वालों को ‘खत्म’ कर दिया जाता है। यहां (भारत में) भी आईआईटी (इंडियन इंफाम्रेशन टेक्नोलोजी) की धारा 66ए थी, जिसके तहत अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात किया गया था। मैंने और अन्य जागरूक लोगों ने इसके खिलाफ पेटीशन दायर किया तो इसे समाप्त किया गया।

…राइटर ब्लागर मर जाता है। यह तो अच्छा नहीं है। मेरे पर भी थ्रेट किया। दो-तीन स्लीपर सेल दिल्ली भेजा। ऐसा बंगला अखबारों में छपा है कि अंसारूल्ला बंगला टीम( यह अलकायदा की टीम है) मुझे खत्म करने के लिए प्रयास कर रही है।

आपको डर नहीं लगता ?

  • आई एम नाट आफरेड। बट आई ट्राई टू बी केयरफुल। आई वील नेवर बी साइलेंस अगेन्स्ट फंडामेटालिज्म….क्रिस्टिज्म।
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