प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई
प्रयागराज की गलियों और परिसरों में इन दिनों एक अलग ही तरह की सरगर्मी महसूस की जा रही है, जो उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हवा का रुख तय करने की क्षमता रखती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं का शहर कहे जाने वाला यह केंद्र एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में है। हाल के महीनों में शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रियाओं में आई प्रशासनिक चुनौतियों के खिलाफ नौजवानों की आवाज को आधार बनाकर राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। एक तरफ जहां युवा अपने भविष्य को लेकर सजग हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस सुलगती हुई परिस्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। हालांकि, धरातल की वास्तविकताओं और प्रदेश की वर्तमान प्रशासनिक स्थिति का गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के पास इन चुनौतियों से पार पाने के लिए न केवल मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति है, बल्कि ठोस प्रशासनिक प्रबंध भी हैं, जो विपक्ष के हर सियासी दांव को विफल करने की क्षमता रखते हैं।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के संभावित कार्यक्रम को लेकर जिस प्रकार का राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है, उसके पीछे विपक्षी दलों की अपनी राजनीतिक मजबूरियां छिपी हैं। आरंभ में परेड मैदान के चयन और बाद में केपी कॉलेज मैदान में आयोजन को स्थानांतरित किए जाने की लंबी प्रक्रिया यह दर्शाती है कि आयोजक अपनी ताकत को लेकर किस कदर आशंकित थे। कांग्रेस संगठन डिजिटल माध्यमों और क्यूआर कोड के जरिए लाखों पंजीकरण के दावे भले ही कर रहा हो, लेकिन कागजी आंकड़ों और जमीनी सच्चाई के बीच का अंतर जगजाहिर है। उत्तर प्रदेश और विशेषकर पूर्वांचल के छात्र भली-भांति समझते हैं कि उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल सतही राजनीतिक रैलियों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रशासनिक सुधारों से ही संभव है। जब छात्र यह देखते हैं कि उनकी आजीविका के संघर्ष को कुछ दल अपने राजनीतिक पुनरुत्थान के मंच के रूप में उपयोग कर रहे हैं, तो वे स्वतः ही ऐसे आयोजनों से दूरी बना लेते हैं। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर विपक्षी दलों के संगठनात्मक ढांचे और समन्वय का अभाव भी ऐसे बड़े आयोजनों की हवा निकालने के लिए पर्याप्त है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून-व्यवस्था और सुचिता के मोर्चे पर किसी भी प्रकार की ढिलाई न बरतने का स्पष्ट संदेश दिया है। बीते दिनों सिविल लाइंस और पत्थर गिरजाघर के आसपास हुए प्रदर्शनों के दौरान जिस तरह से उपद्रव और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं, उनसे यह साबित हो गया कि कुछ बाहरी तत्व और असामाजिक लोग छात्रों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहते थे। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और साक्ष्यों के आधार पर जब इन उपद्रवियों की शिनाख्त की, तो उनमें कई ऐसे चेहरे सामने आए जिनका छात्र राजनीति या पठन-पाठन से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। सरकार का यह रुख पूरी तरह से न्यायसंगत और सराहनीय रहा है कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने वाले वास्तविक छात्रों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो, किंतु कानून को अपने हाथ में लेने वाले हुड़दंगियों से पूरी सख्ती से निपटा जाए। इस कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के चलते असामाजिक तत्वों के हौसले पस्त हुए हैं और आम छात्रों में भी यह विश्वास बढ़ा है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी शून्य सहनशीलता (zero tolerance) की नीति और माफिया-विरोधी सख्त रुख है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए देश के सबसे कड़े कानून लागू किए हैं, जिसके तहत नकल माफियाओं की संपत्तियों को कुर्क करने और आजीवन कारावास तक के प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने केवल जुबानी वादे करने के बजाय जमीनी स्तर पर पारदर्शी और त्वरित भर्तियां सुनिश्चित करके यह साबित कर दिया है कि युवाओं का हित उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री की एक कड़क और पारदर्शी प्रशासक की छवि युवाओं के मन में यह भरोसा जगाती है कि राज्य में उनकी मेहनत का हक किसी बिचौलिए या भ्रष्टाचारी को नहीं खाने दिया जाएगा। यही कारण है कि विपक्षी दलों द्वारा रची जा रही राजनीतिक पटकथा अक्सर जनता और छात्रों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
राजनीतिक विश्लेषक इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ के सुदृढ़ संगठन और बूथ-स्तरीय प्रबंधन का मुकाबला करना किसी भी विपक्षी दल के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। 2024 के चुनावों में कुछ सीटों के उतार-चढ़ाव को आधार बनाकर विपक्ष भले ही अपनी जीत का भ्रम पाल रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य का आम नागरिक और युवा विकास, सुरक्षा और सुशासन के रास्ते से भटकना नहीं चाहता। सरकार समय-समय पर डैमेज कंट्रोल और युवाओं की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के जरिए उन तमाम सुलगती चिंगारियों को बुझाने में सफल रही है, जिन्हें विपक्ष हवा देने की कोशिश करता है। अंततः, प्रयागराज की यह धरती इस बात का प्रमाण है कि केवल राजनीतिक नारों और डिजिटल आंकड़ों के सहारे उत्तर प्रदेश की मजबूत प्रशासनिक नींव को हिलाया नहीं जा सकता। युवाओं के भविष्य की वास्तविक चिंता और उसे अमलीजामा पहनाने का माद्दा यदि किसी के पास है, तो वह योगी सरकार की ठोस नीतियों और निर्णायक नेतृत्व में ही दिखाई देता है।



