
अशोक भाटिया
कहते हैं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना पर यहाँ पंजाब के मुख्यमंत्री भगवत मान ने पंजाब मे चल रहे किसान आन्दोलन को कुचल कर कुल्हाड़ी पर ही पैर दे मारा है। उन्होंने लम्बे समय से चल रहे पंजाब के शंभू और खनौरी बॉर्डर को पुलिस के दम से खदेड़ दिया है ।इस कारण पंजाब में किसान आंदोलन को लेकर लगातार बदलते घटनाक्रम ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। शंभू और खनौरी बॉर्डर पर हुई पुलिस की कार्रवाई और बुलडोजर एक्शन से किसान संगठनों में गहरा असंतोष फैल गया है। पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार, जो अब तक किसानों के समर्थन का दावा करती रही थी, अचानक ही उनके खिलाफ नजर आ रही है। इसका असर यह हुआ कि न केवल किसान, बल्कि विपक्षी दल भी भगवंत मान सरकार पर हमलावर हो गए हैं। बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पंजाब सरकार ने अचानक किसानों के मामले में यू-टर्न क्यों लिया?
विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब सरकार इस पूरे मुद्दे पर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले रही है। पहले भी ऐसा देखा गया था, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। उस समय उन्होंने किसानों को दिल्ली बॉर्डर पर भेज दिया था और केंद्र सरकार को ही इसका समाधान निकालने के लिए मजबूर कर दिया था। तब केंद्र सरकार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था और अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। लेकिन इस बार मामला उल्टा नजर आ रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भगवंत मान और उनकी सरकार खुद ही इस विवाद को अपने सिर ले रही है। आम आदमी पार्टी ने किसान आंदोलन को केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया, मगर अब इन्हीं अन्नदाताओं ने पंजाब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सीएम भगवंत मान का कहना है कि किसानों ने पंजाब को धरने वाला राज्य बना दिया है। पिछले सोमवार को वह किसान नेताओं की मीटिंग को बीच में ही छोड़कर चले आए। अरविंद केजरीवाल भी इन दिनों पंजाब में विपश्यना कर रहे हैं, मगर किसानों की मांगों पर चुप हैं। दिल्ली चुनाव में हार के बाद हालात इतनी तेजी से बदले कि किसानों को दिल्ली में धरने के लिए निमंत्रण देने वाली आम आदमी पार्टी की मान सरकार ने किसानों को चंडीगढ़ में एंट्री नहीं दी।
गौरतलब है कि वर्ष 2022 के पंजाब चुनाव में आम आदमी पार्टी ने किसान आंदोलन को समर्थन देने और हर हाल में उनके साथ खड़े रहने का वादा किया था। पंजाब चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत में भी किसानों के समर्थन की बात कही गई थी। शुरू में तो किसान आंदोलनकारियों को भगवंत मान और उनकी सरकार समर्थन देती रही, क्योंकि केंद्र सरकार पर आरोप मढ़े जाते रहे। अब वही पंजाब सरकार ने पीछे हटते हुए किसानों के खिलाफ पुलिस और बुलडोजर लगा दिया।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी हो रही है कि किसानों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की एक वजह लुधियाना वेस्ट विधानसभा सीट पर संभावित उपचुनाव भी हो सकता है। खबरों के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल को लुधियाना के व्यापारियों से यह फीडबैक मिला था कि अगर किसानों का प्रदर्शन जारी रहा, तो वे आम आदमी पार्टी को वोट नहीं देंगे। इससे व्यापारियों का कारोबार प्रभावित हो रहा था। इसी कारण पंजाब सरकार ने बॉर्डर खाली कराने का फैसला लिया। हालांकि, यह उपचुनाव अभी कब होगा, इसका भी कोई ठोस संकेत नहीं मिला है।
आम आदमी पार्टी किसानों से बातचीत कर इस मामले का शांतिपूर्ण हल निकाल सकती थी। लेकिन सरकार ने जल्दबाजी में किसानों के खिलाफ कार्रवाई कर दी, जिससे मामला और बिगड़ गया।यह भी ध्यान देने वाली बात है कि हाल ही में दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला सामने आया है। इसके अलावा दिल्ली हाईकोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय ने अरविंद केजरीवाल की जमानत को चुनौती दी है। ऐसे में कुछ लोग मान रहे हैं कि इस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए भी यह कार्रवाई हो सकती है। अगर सरकार इस मसले को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर हल करने देती, तो पंजाब सरकार पर कोई दोष नहीं आता। लेकिन अब सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किसानों के खिलाफ इतना सख्त एक्शन क्यों लिया गया। पूरे घटनाक्रम को देखते हुए कहा जा सकता है कि मामला पूरी तरह से राजनीतिक है और इसके पीछे कोई न कोई रणनीति जरूर है।
पंजाब सरकार की इस कार्रवाई से आम आदमी पार्टी को राजनीतिक नुकसान हो सकता है। 2022 में किसानों के समर्थन के दम पर सत्ता में आई यह पार्टी अब उन्हीं किसानों के खिलाफ कड़े कदम उठा रही है। ऐसे में किसान संगठनों की नाराजगी भविष्य में आम आदमी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। एक समय पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान आंदोलनकारी किसानों और केंद्र सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। हालांकि अब उनके रुख में 360 डिग्री का बदलाव आया है। वह पंजाब के गृह मंत्री भी हैं और उन्होंने किसान आंदोलन को समाप्त कराने और किसानों को हिरासत में लेने का कड़ा फैसला लिया है। इस कार्रवाई से राज्य की आम आदमी पार्टी सरकार की भारी आलोचना हुई है। विपक्षी दल मान शासन पर निशाना साध रहे हैं। पंजाब के उद्योग मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंध ने कहा कि वे किसानों का सम्मान करते हैं, लेकिन प्रमुख सड़कों के अवरुद्ध होने से व्यापार प्रभावित हो रहा है।
मंत्री सोंध ने कहा, ‘हमने हमेशा किसानों का सम्मान किया है और उनका समर्थन किया है, लेकिन राजमार्गों पर इन अवरोधों से व्यापार प्रभावित हो रहा है, इसलिए सड़कें खोलने की जरूरत है।’ उल्लेखनीय है कि भगवंत मान सरकार और किसानों के बीच मतभेद इस महीने की शुरुआत से ही बढ़ने लगे थे। सबसे पहले, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने 3 मार्च को संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के किसान नेताओं के साथ चल रही बैठक से वॉकआउट कर दिया। बाद में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य की सीमाओं पर सड़के अवरुद्ध कर धरना प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि इससे पंजाब को आर्थिक नुकसान हो रहा है।
बताया जाता है कि मार्च के शुरू में ही पंजाब सरकार और किसान नेताओं की एक मीटिंग हुई थी। लेकिन, कोई नतीजा नहीं निकला। बल्कि, बात और भी बिगड़ गई। किसान अपनी मांगों को लेकर चंडीगढ़ के घेराव पर अड़े हुए थे, और भगवंत मान ऐसा करने से मना कर रहे थे। मीटिंग में कई मुद्दों पर किसान नेताओं और मुख्यमंत्री में बहस हो गई, और कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई। मुख्यमंत्री भगवंत मान को गुस्सा आ गया तो बोले, ‘जाओ करते रहो धरना, अब कुछ नहीं होने वाला।’ये कहते हुए बीच में ही मीटिंग से उठे और चले गये – और उसके बाद से पंजाब पुलिस की छापेमारी शुरू हो गई। कई किसान नेता घर पर नहीं मिले, लेकिन कुछ हिरासत में जरूर ले लिये गये।
अगले ही दिन मीडिया से बातचीत में भगवंत बोले, ‘हां, मैं बैठक छोड़कर चला गया।।। और हम उन्हें हिरासत में भी लेंगे…. किसानों को पटरियों और सड़कों पर बैठने की अनुमति नहीं देंगे… मैं पंजाब के तीन करोड़ लोगों का संरक्षक हूं।’चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने जा रहे किसानों को पंजाब पुलिस ने गांवों में ही रोक दिया। बलबीर सिंह राजेवाल, और जोगिंदर उगराहां जैसे बड़े किसान नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
और अब बॉर्डर पर पंजाब पुलिस का एक्शन हुआ है। ये सब देखकर समझना मुश्किल हो रहा है कि क्या किसान भगवंत मान के गुस्से का शिकार हो रहे हैं। या पंजाब में मौजूद आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के निर्देश पर किसानों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। अगर पंजाब सरकार मानती है कि किसानों की मांगें केंद्र सरकार से जुड़ी है, तो ये एक्शन पहले ही होना चाहिये था। अगर पहले ही एक्शन हो गया होता तो इतना बवाल भी नहीं होता – और किसानों से लेकर विपक्षी दलों के निशाने पर आने से मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी बच सकती थी।
कहने को तो आम आदमी पार्टी के पंजाब चीफ अमन अरोड़ा सरकार के रुख में किसी तरह के बदलाव से इनकार करते हैं। कहते हैं, किसान जब चाहें बातचीत फिर से शुरू कर सकते हैं। हालांकि, उनका कहना है, वे बड़ी संख्या में नहीं आ सकते। किसानों की ज्यादातर मांगें केंद्र सरकार से संबंधित हैं, लेकिन हम पर उनको दबाव बनाने की इजाजत नहीं देंगे। हम समानांतर व्यवस्था नहीं चलाने देंगे। हर मामले में उनका हस्तक्षेप नहीं होने देंगे। किसानों को हम पर हुक्म चलाने नहीं देंगे।
पंजाब में आम आदमी पार्टी नेताओं द्वारा दिए गए प्रत्येक बयान में अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि राजमार्गों के बंद होने से व्यापार को भारी नुकसान हो रहा है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आप सरकार राज्य की बिजनेस कम्युनिटी के हितों को ध्यान में रख रही है। मान सरकार का तर्क है कि उसने राज्य के व्यापारियों और अर्थव्यवस्था के हित में शंभू और खनौरी बॉर्डर को प्रदर्शनकारी किसानों से खाली कराने का फैसला लिया है।
आने वाले समय में लुधियाना पश्चिम सीट पर उपचुनाव होने वाला है। आम अदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने हाल ही में लुधियाना का दौरा किया था। यहां की इंडस्ट्री और बिजनेस कम्युनिटी ने दोनों को स्पष्ट रूप से बताया था कि किस तरह से किसान आंदोलन और राजमार्गों की नाकेबंदी व्यापार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। सूत्रों का दावा है कि इसके बाद से ही राज्य सरकार ने किसान आंदोलन को खत्म करने और अवरुद्ध सड़कों को खोलने का मन बना लिया था।
पंजाब सरकार का तर्क है कि उसने राज्य की अर्थव्यवस्था और व्यापार के हित में किसानों के आंदोलन को उखाड़ने का काम किया है। हालांकि, यह तो समय ही बताएगा कि मान सरकार का यह कदम सही है या कृषि आधारित राज्य के लिए उसका एक बड़ा दांव है। राज्य सरकार ने भले ही उद्योग और व्यापार को तरजीह दी है, लेकिन जिस तरह से किसानों को हिरासत में लिया गया और उनके आंदोलन को कुचला गया, उससे आप सरकार के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो सकती है। क्योंकि पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां दो साल बाद चुनाव होने हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी के लिए किसानों की नाराजगी से निपटने में मुश्किल हो सकती है। हालांकि, धरना प्रदर्शन को समाप्त कराकर आप राज्य की गैर-किसान आबादी को भी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि राज्य सरकार को उनकी भी चिंता है।
अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार